मनोरंजन या मर्यादा का हनन? सोशल मीडिया पर देवी-देवताओं के मखौल का बढ़ता ट्रेंड
भारत एक ऐसा देश है जहाँ आस्था केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने का आधार है। यहाँ देवी-देवताओं को करोड़ों लोग अपनी श्रद्धा का केंद्र मानते हैं। लेकिन आज सोशल मीडिया और डिजिटल युग में 'व्यूज' और 'लाइक्स' पाने की अंधी दौड़ में अक्सर इन पवित्र प्रतीकों का मखौल उड़ाया जाता है।
हाल ही में उत्तराखंड के हल्द्वानी में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नीतू बिष्ट के एक व्लॉग को लेकर उपजा विवाद इसका ताज़ा उदाहरण है, जिसमें वह माँ काली का रूप धारण कर सार्वजनिक सड़कों पर घूमती और मोमोज खाती दिखाई दीं। इसके विरोध में करणी सेना और अन्य हिंदूवादी संगठनों ने पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग की है।
यह पहली बार नहीं है: पूर्व के प्रमुख विवाद
मनोरंजन या 'क्रिएटिव फ्रीडम' के नाम पर सनातन प्रतीकों को सॉफ्ट टारगेट बनाने का यह सिलसिला काफी पुराना है:
- वेब सीरीज़ विवाद: ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर आई 'तांडव' जैसी वेब सीरीज़ में भगवान शिव के चरित्र को आधुनिक और आपत्तिजनक तरीके से मंच पर प्रस्तुत करने पर देशव्यापी विरोध हुआ था।
- स्टैंड-अप कॉमेडी: मुनव्वर फारुकी जैसे कई स्टैंड-अप कॉमेडियन्स पर अपने शोज़ के दौरान हिंदू देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं पर अभद्र व संवेदनशील टिप्पणियां करने के गंभीर आरोप लगे, जिसके बाद उन्हें कानूनी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा।
- फिल्मों में अनुचित चित्रण: हाल के वर्षों में कई बड़े बजट की फिल्मों (जैसे 'आदिपुरुष') में भी रामायण और उसके दिव्य पात्रों के संवादों और चित्रण के स्तर को गिराने के प्रयास देखे गए, जिसे समाज ने सिरे से नकार दिया।
मनोरंजन के नाम पर आस्था का ऐसा सरलीकरण समाज में गहरा असंतोष पैदा कर रहा है। ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है, और भारतीय कानून में इसके लिए कड़े प्रावधान मौजूद हैं।
धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने से जुड़े कड़े कानूनी पहलू
भारतीय कानूनी व्यवस्था में किसी भी धर्म या धार्मिक प्रतीकों के अपमान को रोकने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) और IT एक्ट में स्पष्ट धाराएं शामिल हैं:
- BNS की धारा 299 (पहले IPC 295A): यह धारा सबसे महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए शब्दों, संकेतों, या दृश्यों का सहारा लेता है, तो यह एक संज्ञेय (cognizable) और गैर-जमानती अपराध है। इसमें दोषी पाए जाने पर तीन वर्ष तक की कैद या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है।
- BNS की धारा 196 (पहले IPC 153A): यदि सोशल मीडिया या किसी सार्वजनिक मंच के माध्यम से विभिन्न समूहों या धर्मों के बीच नफरत, दुश्मनी या वैमनस्य फैलाने का प्रयास किया जाता है, तो इस धारा के तहत कार्रवाई होती है। इसमें भी 3 साल तक की जेल का नियम है।
- सूचना प्रौद्योगिकी (IT) एक्ट की धारा 67: यदि धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली या अपमानजनक सामग्री को डिजिटल रूप से (यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि पर) प्रसारित किया जाता है, तो इस कानून के तहत भी मामला दर्ज किया जा सकता है।
निष्कर्ष
क्रिएटिविटी और कॉमेडी का स्वागत है, लेकिन जब यह दूसरों की आस्था का मखौल उड़ाने लगे, तो यह अपराध की श्रेणी में आ जाता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी कभी भी दूसरों की धार्मिक भावनाओं को कुचलने का लाइसेंस नहीं हो सकती। क्रिएटर्स को यह समझना होगा कि लोकप्रियता पाने के लिए शॉर्टकट अपनाना और किसी धर्म को 'सॉफ्ट टारगेट' बनाना कानूनी और नैतिक रूप से पूरी तरह गलत है।
— Ritesh Choubey
Founder & Chief Editor, The Sovereign Vāk Journal

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