गुदड़ी के लाल: बिन्देश्वरी दूबे — सचिवालय का आठवां योद्धा और बेरमो की नियति (भाग 5)
"पिछले भाग (भाग 4) में हमने देखा कि कैसे तमाम अभावों और संघर्षों को मात देकर बिन्देश्वरी बाबू ने प्रतिष्ठित 'बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग' (वर्तमान NIT पटना) में दाखिला पाकर अपनी पहली बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन नियति ने उनके लिए कोई और ही रास्ता चुना था। इंजीनियरिंग की यह पढ़ाई अभी चल ही रही थी कि सन 1942 में महात्मा गांधी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' और 'करो या मरो' का नारा फूंक दिया। राष्ट्रभक्ति के इस महाआह्वान ने युवा बिन्देश्वरी के भीतर के इंजीनियर को हमेशा के लिए देश सेवा के महासमर में झोंक दिया। आइए, आज की इस कड़ी (भाग 5) में चलते हैं 19 अगस्त 1942 के उस खौफनाक और ऐतिहासिक दिन की ओर, जहाँ पटना सचिवालय गोलियों की गूंज से दहल उठा था और सात शहीदों के खून से लथपथ धरती पर इतिहास को मिलने वाला था अपना आठवां अनाम योद्धा..."
इंजीनियरिंग की तिलांजलि: राष्ट्र या करियर?
"ठुकरा दो यह विभव,
वज्र-सा चमके आज तुम्हारा त्याग,
इस तरुणाई के उर में भी
सुलग उठे अब राष्ट्र की आग।"
— बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
एक मेधावी छात्र का अपना चमकता हुआ भविष्य, डिग्री और करियर को लात मार देना कोई मामूली बात नहीं थी। इस वैचारिक द्वंद्व और त्याग पर बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की ये पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जो करियर के मोह को तोड़ने को दर्शाती हैं।
वर्ष 1942 में जब महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के माध्यम से देश के युवाओं को 'करो या मरो' का नारा दिया, तो पटना इंजीनियरिंग कॉलेज के गलियारों में एक वैचारिक द्वंद्व चल रहा था। एक तरफ एक मेधावी छात्र का सुनहरा करियर और इंजीनियर बनने का सपना था, तो दूसरी तरफ बेड़ियों में जकड़ी भारत माता की पुकार। 'गुदड़ी के लाल' बिंदेश्वरी दूबे ने बिना किसी संकोच के राष्ट्र को चुना। उन्होंने अपने कॉलेज की चौखट पर श्रद्धा से माथा टेका, अपनी तकनीकी शिक्षा को तिलांजलि दी, और स्वाधीनता के समर में सीधे कूद पड़े।
पटना सचिवालय गोलीकांड (11 अगस्त 1942): आठवां नायक
"खोल दे अपनी कतरनें,
आज ओ स्वाधीनता के दीवाने,
देख झंडा गिर न जाए,
चाहे सौ सिर पड़ें गंवाने।"
— माखनलाल चतुर्वेदी
7 छात्र शहीद हो चुके थे, लाशें गिर रही थीं, और ऐसे खौफनाक मंजर में 8वां छात्र (बिन्देश्वरी बाबू) गोलियों के बीच आगे बढ़कर तिरंगा फहराता है। इस जान हथेली पर लेकर झंडा फहराने के दृश्य के लिए पं. माखनलाल चतुर्वेदी की यह झकझोर देने वाली पंक्ति सबसे सटीक है।
अगस्त 1942 की शुरुआत में डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह जैसे बिहार के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में पटना की सड़कें छात्रों के आक्रोश से उबल रही थीं। 11 अगस्त 1942 की सुबह, लगभग 6,000 निहत्थे छात्रों का एक विशाल हुजूम पटना सचिवालय की ओर बढ़ा। उनका एकमात्र संकल्प था—सचिवालय की इमारत पर दासता का प्रतीक यूनियन जैक उतारकर आज़ाद भारत का तिरंगा फहराना।
तत्कालीन ब्रिटिश जिला मजिस्ट्रेट डब्ल्यू. जी. आर्चर के आदेश पर सैन्य पुलिस ने सचिवालय के पूर्वी गेट पर डटे इन निहत्थे छात्रों पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इतिहास गवाह है कि जब भी तिरंगा थामे किसी छात्र को गोली लगती, दूसरा छात्र जमीन पर झंडा गिरने से पहले उसे थाम लेता। इस क्रूर दमन में सात युवा छात्रों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, जिन्हें आज पूरा देश 'सात शहीद' (Seven Martyrs) के रूप में पूजता है।
लेकिन इतिहास के पन्नों में जो दर्ज नहीं हो सका, वह यह है कि गोलियों की उस भयंकर बौछार के बीच वह आठवां युवा छात्र, जिसने अंततः आगे बढ़कर सचिवालय के शीर्ष पर तिरंगा लहराया, वह खुद 20 वर्षीय बिंदेश्वरी दूबे थे। झंडा फहराने के बाद वे ब्रिटिश पुलिस की आंखों में धूल झोंककर वहां से फरार होने में सफल रहे।
पटना स्टेशन पर विद्रोह और हजारीबाग जेल की तपस्या
सचिवालय गोलीकांड की खबर फैलते ही पूरे प्रांत में क्रांति की आग भड़क उठी। बिंदेश्वरी बाबू और उनके साथी छात्र नेताओं की अगुवाई में 12 और 13 अगस्त को उग्र प्रदर्शनकारियों ने अंग्रेजों की संचार व्यवस्था और रसद आपूर्ति को ध्वस्त करने के लिए पटना रेलवे स्टेशन सहित कई स्टेशनों पर धावा बोल दिया। रेल पटरियां उखाड़ दी गईं और टेलीग्राफ के तार काट दिए गए।
इस तीखी मुठभेड़ के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने पटना में कर्फ्यू लगा दिया और बिंदेश्वरी दूबे समेत अनेकों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेज दिया। हजारीबाग जेल के वह ढाई वर्ष बिंदेश्वरी बाबू के भावी राजनैतिक जीवन की सबसे बड़ी पाठशाला साबित हुए। यहीं उनकी मुलाकात लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी), अनुग्रह नारायण सिंह, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और विशेषकर के. बी. सहाय जी से हुई। इन महानायकों के साथ जेल की कोठरी में बिताए समय ने उनके राजनैतिक दर्शन को और प्रगाढ़ कर दिया।
भूमिगत आंदोलन, 'गुंडा' का तमगा और समानांतर सरकारें
"अपनों के विघ्न-बाधाओं से, जब-जब यह पग डगमगाए हैं,
तब-तब अंतस की पीड़ा से, केवल यह गीत ही गाए हैं।
चाह नहीं कौतूहल की, ना ही मैं जग में नाम चाहता हूँ,
पर अपनों के ही हाथों, मैं क्यों यह लांछन पाता हूँ?"
— अटल बिहारी वाजपेयी
जब एक इंसान देश के लिए अपना सब कुछ फूंक चुका हो, और अपने ही गाँव के लोग उसे 'गुंडा' कहकर दरवाजे बंद कर लें, तो अंदर से जो बेबसी और दर्द उठता है, उसे अटल बिहारी वाजपेयी की यह प्रसिद्ध कविता सबसे गहराई से छूती है।
1944 में जेल से रिहा होने के बाद, बिंदेश्वरी बाबू अपने बड़े भाई राजेंद्र दूबे (जो पुलिस में जमादार थे) के सिंदरी (धनबाद) स्थित सरकारी क्वार्टर में रहने लगे। लेकिन क्रांतिकारी मन शांत बैठने वाला नहीं था। वे महान नेता के. बी. सहाय के गुप्त संपर्क में रहकर भूमिगत हो गए और गांधीवादी रचनात्मक कार्यों से जुड़ गए। वे बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों में घूम- घूमकर अंग्रेजों के खिलाफ 'समानान्तर सरकारें' (Parallel Governments) बनाने लगे। चरखा कातना, साक्षरता अभियान और सांप्रदायिक सौहार्द के जरिए वे ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें खोखली कर रहे थे।
विडंबना देखिए, जब वे इस राष्ट्रसेवा के दौरान अपने पैतृक गाँव महुआंव जाते, तो रूढ़िवादी ग्रामीण उन्हें 'गुंडा' कहकर संबोधित करते और डर के मारे अपने दरवाजे बंद कर लेते थे। उनके साथियों के माता-पिता उनके माता-पिता से शिकायत करते कि "नुन्नू उनके बच्चों को बिगाड़ रहा है।" जब पुलिस लगातार सिंदरी क्वार्टर पर छापे मारने लगी, तो उन्हें सिंदरी छोड़ना पड़ा।
बेरमो की धरती: मसीहा का नया ठिकाना
"मौन भी अभिव्यंजना है,
जितना तुम्हारा सच है, उतना ही कहो,
तुम थक कर सीढ़ियों पर बैठ गए तो क्या, राह अभी बाकी है, चलते रहो।"
— सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
24 साल का एक नौजवान, जेब खाली, भूखा-प्यासा एक बंद होती कैंटीन की सीढ़ियों पर गुमसुम बैठा है। इस अकेलेपन, अनिश्चितता और संघर्ष के क्षण को अज्ञेय की यह पंक्ति बिल्कुल जीवंत कर देती है।
सिंदरी से फरार होकर वे वापस गाँव पहुँचे। इसी दौर में उनकी प्रथम पुत्री राजमणि का जन्म हुआ। कड़े मिजाज पिता ने बड़े भाई का उदाहरण देते हुए उन्हें डांटा:
"देखऽ नुन्नू, बड़कू के देखऽ! उ पुलिस हउवन! कमावेलेऽ! तू का करेलऽ नेतागिरी? ओऽसे का होई? अब तू बाल-बच्चेदार हो गईलऽ! कमाई धमाई करऽ! बुझलऽ?"
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| पंडित बिन्देश्वरी दूबे जी की सुपुत्रियां—श्रीमती मनोरमा चौबे (बाएं) और श्रीमती राजमणि चौबे (दाएं) अपने बच्चों के साथ एक दुर्लभ पारिवारिक क्षण में। |
परंतु नियति उन्हें मजदूरों का भाग्य बदलने के लिए चुन चुकी थी। एक बार पटना रेलवे स्टेशन के पास एक अंग्रेज ऑफिसर ने उन्हें पहचान लिया और पीछा करने लगा। बिंदेश्वरी बाबू भागते हुए प्लेटफॉर्म पर पहुंचे और उस ऑफिसर को जोरदार धक्का देकर चलती ट्रेन में सवार हो गए। कई घंटों के सफर के बाद वे तत्कालीन हजारीबाग (अब बोकारो) जिले के बेरमो स्टेशन पर उतरे।
भूखे-प्यासे, बिना पैसों के, 23 वर्षीय बिंदेश्वरी एक बंद हो रही कैंटीन की सीढ़ियों पर बैठकर आगे की रणनीति सोच रहे थे। तभी पीछे से एक उम्रदराज व्यक्ति ने उनके कंधे पर हाथ रखा और पूछा, "स्वतंत्रता सेनानी हैं क्या आप?"
बिंदेश्वरी बाबू संकोच में उठकर जाने लगे, तो उन्होंने रोका, "आइए, कुछ खा लीजिए।"
दूबे जी ने स्वाभिमान से कहा, "भूख नहीं है।"
उस भले व्यक्ति ने मुस्कुराकर कहा, "भूख नहीं है या पैसा नहीं है? मैं इस कैंटीन का मालिक हूँ। आइए, पहले कुछ खा लीजिए, फिर बात करेंगे।"
उन सहृदय व्यक्ति का नाम 'झा जी' था। वे उस रात इस क्रांतिकारी को न सिर्फ अपने घर ले गए, बल्कि कई महीनों तक अपने परिवार के सदस्य की तरह शरण दी। यहीं से बेरमो की उस पवित्र धरती पर भारत के सबसे बड़े 'मजदूर मसीहा' के उदय की पटकथा लिखी गई।
— Ritesh Choubey
Founder & Chief Editor,बेरमो की कोयला खदानों का वो नरकीय जीवन, निजी माफियाओं का आतंक और कैसे एक २४ वर्षीय नौजवान ने देश के सबसे बड़े 'मजदूर मसीहा' के रूप में जन्म लिया—यह जानने के लिए हमारी इस विशेष श्रृंखला का अगला भाग (भाग-6) शीघ्र ही आ रहा है।
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राजनीति के शोर में सादगी और ईमानदारी की मिसाल कहीं खो गई है। हमारी इस विशेष सीरीज 'गुदड़ी के लाल' के अगले भाग, पंडित बिंदेश्वरी दुबे जी के जीवन के अनछुए पहलुओं और प्रेरणादायक किस्सों के सीधे अपडेट्स अपने इनबॉक्स में पाने के लिए आज ही हमारे फ्री न्यूज़लेटर को सब्सक्राइब करें।


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