सिनेमा का मनोविज्ञान: दिल्ली-मुंबई के रंगमंच से झारखंड की माटी तक का सफर

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सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन या पर्दे पर नाचते हुए किरदारों की कहानी नहीं है; यह इंसानी समाज के अवचेतन मन (Subconscious Mind) का साक्षात आईना है। रंगमंच (Theater) और सिनेमा की दुनिया में दिल्ली की गलियों से लेकर मुंबई की मायानगरी तक के 12 वर्षों के गहरे और जमीनी अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि हर महान कहानी के पीछे एक गहरा सामाजिक मनोविज्ञान काम करता है। एक कलाकार और लेखक के रूप में, मैंने देखा है कि कैसे एक स्क्रिप्ट समाज की सोच को बदल सकती है। आज, जब मैं वापस अपनी झारखंड की पावन माटी पर लौट आया हूँ, मेरा संकल्प यहाँ की समृद्ध संस्कृति, लोक-कलाओं और क्षेत्रीय सिनेमा को एक नई, अंतरराष्ट्रीय पहचान देना है। चक्र बुद्धि (Chakra Buddhi) के इस सेक्शन में, हम आधुनिक फिल्मों, कला के गिरते स्तर और सिनेमा के छिपे हुए मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर बेबाक और बारीक विमर्श करेंगे।

— Ritesh Choubey

                                              Founder & Chief Editor, 
                                                           Rajyog Journal

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