प्रस्तावना: नियति का अनोखा चक्रव्यूह
"कर्म प्रधान बिस्व करि राखा। जो जसु करइ सो तसु फलु चाखा॥"
(अर्थ: विधाता ने कर्म को ही इस संसार में प्रधान बना रखा है। जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल पाता है।)
इतिहास केवल सूखी तारीखों और पन्नों पर सिमटी घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं है। असली इतिहास तब बनता है, जब कोई असाधारण व्यक्तित्व अपनी रगों में बहते स्वाभिमान और फौलादी इरादों के दम पर नियति के लिखे को बदल देता है। साल 1985 से 1988 के बीच अखंड बिहार के मुख्यमंत्री और भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री रहे पंडित बिन्देश्वरी दूबे की राजनीतिक ऊंचाई से तो पूरी दुनिया वाकिफ है, लेकिन राजनीति के इस शीर्ष तक पहुँचने के पीछे घोर अभावों, कड़े अनुशासन और एक आत्मसम्मान से उपजी जो संघर्ष गाथा है, उसे जानना आज की पीढ़ी के लिए किसी प्रेरणापुंज से कम नहीं है। आइए, पन्नों को पलटते हैं और चलते हैं उस अतीत में जहाँ एक 'गुदड़ी का लाल' आकार ले रहा था।
 |
बिंदेश्वरी दूबे फाउंडेशन के संस्थापक रितेश चौबे, नाना बिंदेश्वरी दूबे की प्रतिमा के समक्ष
|
भाग 1: महुआंव ग्राम का वो रहस्यमयी किसान परिवार
"राम झरोखे बैठ के, सबका मुजरा लेत।
जैसी जिसकी चाकरी, वैसा उसको देत॥" ✍️
— संत कबीरदास
"एक तरफ छह महीने की मौन साधना का कठिन आध्यात्मिक त्याग और दूसरी तरफ घोर विपत्तियों के बीच घर को रीढ़ की तरह संभालती एक माँ की अदम्य इच्छाशक्ति; इस रहस्यमयी किसान परिवार की पृष्ठभूमि को संत कबीर की ये पंक्तियाँ पूरी तरह परिभाषित करती हैं..."
यह कहानी शुरू होती है तत्कालीन शाहाबाद और वर्तमान भोजपुर जिले के 'महुआंव' ग्राम से। इस गाँव में एक साधारण किसान परिवार रहता था, जिसके मुखिया थे श्री शिव नरेश दूबे। शिव नरेश जी कोई आम किसान नहीं थे, बल्कि कड़े अनुशासन के धनी और एक रहस्यमयी आध्यात्मिक चक्र को जीने वाले साधक थे। उनका जीवन दो हिस्सों में बंटा था—साल के छह महीने वे पूरी तरह सांसारिक कार्यों से विमुख होकर प्रभु-स्मरण और साधना की गहरी निद्रा में लीन रहते थे, और बाकी के छह महीने कड़े अनुशासन के साथ गृहस्थी और खेती संभालते थे।
 |
| बिन्देश्वरी दूबे की द्वितीय पुत्री मनोरमा के विवाह के समय की पारिवारिक तस्वीर |
जब वे अपनी साधना के दौर में होते, तब घर की पूरी जिम्मेदारी उनकी धर्मपत्नी श्रीमती जानकी देवी के कंधों पर आ जाती थी। जानकी देवी ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के दम पर, बिना किसी शिकायत के, उस दौर की घोर विषम परिस्थितियों में भी न सिर्फ घर को संभाला, बल्कि अपने बच्चों को उच्च संस्कारों की छांव भी दी।
भाग 2: मकरसंक्रांति का चमत्कार और 'नुन्नू' का आगमन
"कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥"
(अर्थ: संसार में ऐसा कौन सा कठिन काम है, जो प्रभु की कृपा से संभव न हो सके।)
समय का चक्र घूमा और तारीख आई 14 जनवरी 1921—मकरसंक्रांति का पवित्र दिन। नियति के क्रूर खेल ने जानकी देवी की कोख से जन्म तो दो जिंदगियों को दिया, पर एक ने दुनिया देखने से पहले ही आँखें मूँद लीं... और दूसरी नन्हीं जान अपनी आखिरी साँसों के लिए जूझ रही थी। वह बच्चा मरणासन्न स्थिति में था, सांसें मानो धागे से लटकी थीं। उस दौर में चिकित्सा सुविधाएं न के बराबर थीं, और जो कुछ था, वह भगवान का भरोसा ही था। चूंकि शिव नरेश के दादा रामदेनी (रामधनी) दूबे, विंध्याचल के निकट, उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से महुआंव आकर बसे थे इसलिए दूबे परिवार की विंध्याचल की सिद्ध शक्तिपीठ में अटूट आस्था थी। नवजात की ऐसी दशा देखकर पूरा परिवार विन्ध्यवासिनी माता के चरणों में प्रार्थना रत हो गया। और फिर हुआ एक चमत्कार! माँ विन्ध्येश्वरी के आशीर्वाद और महुआंव ग्राम के कुलदेवता के प्रताप से वह मरणासन्न बालक न सिर्फ जी उठा, बल्कि उसकी आँखों में जीवन की एक नई चमक कौंध गई। माँ विन्ध्येश्वरी की असीम कृपा के कारण ही माता-पिता ने उसका नाम 'बिन्देश्वरी प्रसाद दूबे' रखा। जी हां, वह शिशु कोई साधारण बालक नहीं बल्कि खुद 'मजदूर मसीहा' पंडित बिंदेश्वरी दूबे थे। परिवार और गाँव के लोग उन्हें प्यार से 'नुन्नू जी' कहकर पुकारने लगे।
भाग 3: दादा का संस्कार, बाल-विवाह और पिता का वो ऐतिहासिक थप्पड़
"होइहैं वही जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥"
(अर्थ: होना वही है जो ईश्वर ने तय कर रखा है, इंसानी तर्क उसके आगे छोटे पड़ जाते हैं।)
नुन्नू जी के भीतर देशभक्ति और संस्कारों के बीज बोने का काम उनके दादा श्री सुरीठ (सुरीष्ठ) दूबे ने किया। मात्र 8-10 वर्ष की कोमल आयु में बालक बिन्देश्वरी को पूरी रामायण कंठस्थ हो चुकी थी। वे जब चौपाइयां गाते, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध रह जाते। उस दौर की कुप्रथा के अनुसार, बहुत कम उम्र में ही उनका बाल-विवाह कर दिया गया। लेकिन बिन्देश्वरी की आँखों में खेतों की मिट्टी से इतर, किताबों के पन्नों में छिपा एक बड़ा सपना अंगड़ाइयां ले रहा था—उन्हें इंजीनियर बनना था!
 |
| पत्नी शिव शक्ति देवी के साथ बिंदेश्वरी दूबे |
एक दिन, जब वे अपनी किताबों में खोए थे, उनके पिता शिव नरेश दूबे ने कड़े लहजे में कहा, "किताब बंद करऽ अउर खेत में जाके काम करऽ!" (किताब बंद करो और खेत में जाकर काम करो!)। बालक बिन्देश्वरी के कदम नहीं उठे, वे अपनी जिद पर अड़े रहे। पिता के भीतर का अनुशासन गुस्से में बदल गया और उन्होंने बालक के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
वह थप्पड़ सिर्फ एक पिता की डांट नहीं था, बल्कि वह नियति का एक ऐसा प्रहार था जिसने बालक के भीतर सोए अदम्य आत्मसम्मान के शेर को जगा दिया। स्वाभिमान से छटपटाते हुए उन्होंने उसी क्षण तय किया कि वे अब इस घर का अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। बिना किसी से कुछ कहे, जेब में एक धेला न होते हुए भी, वे पैरों में बिना चप्पल के महुआंव गाँव को छोड़कर पैदल ही अपने मामा के घर 'कटैया' ग्राम के लिए निकल पड़े। नियति ने अपना रास्ता चुन लिया था।
 |
| संत माइकल हाई स्कूल, पटना |
भाग 4: संत माइकल का 'गार्ड रूम' और बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग
"लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।"
— सोहनलाल द्विवेदी
"हाड़ कंपाने वाली ठंड में स्कूल के 'गार्ड रूम' के ठंडे फर्श पर सोना, फीस के लिए मजदूरी करना, और फिर देश के सबसे कठिन इंजीनियरिंग एग्जाम में सफलता का परचम लहराना! एक साधारण 'गुदड़ी के लाल' की विपरीत परिस्थितियों पर इस पहली ऐतिहासिक जीत को ये पंक्तियाँ पूरी तरह जीवंत कर देती हैं..."
घर छोड़ने के बाद का सफर कांटों से भरा था। मामा के घर कुछ समय रहने के बाद, आगे की पढ़ाई के लिए वे पटना आ गए। पटना के प्रतिष्ठित 'संत माइकल स्कूल' में दाखिला तो मिल गया, लेकिन रहने और खाने का कोई ठिकाना नहीं था। जरा कल्पना कीजिए, जिस बालक के स्वाभिमान ने पिता का घर छुड़वा दिया, उसने पटना की हाड़ कंपाने वाली ठंड में स्कूल के 'गार्ड रूम' के ठंडे फर्श पर सोकर रातें बिताईं। अपने खर्च और पढ़ाई की फीस के लिए वे छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते और दिन में कारखाने में कड़ा शारीरिक श्रम भी करते थे।
 |
| बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अभी का एनआईटी, पटना) |
भूख, कड़ाके की ठंड और कड़ा संघर्ष भी उनके इंजीनियर बनने के इरादे को डिगा नहीं सका। उन्होंने न सिर्फ संत माइकल से शानदार अंकों के साथ मैट्रिक की परीक्षा पास की, बल्कि अपनी कड़ी मेहनत के बल पर उस जमाने के सबसे प्रतिष्ठित और कठिन माने जाने वाले 'बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग' (वर्तमान NIT पटना) की प्रवेश परीक्षा में भी सफलता का परचम लहरा दिया! यह एक साधारण 'गुदड़ी के लाल' की उस व्यवस्था और विपरीत परिस्थितियों पर पहली बड़ी जीत थी, जिसने आगे चलकर उन्हें मजदूरों का मसीहा और फिर पूरे सूबे का प्रधान सेवक बना दिया।
(क्रमशः... अगले भाग में जानिए कैसे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बीच शुरू हुआ उनका मजदूर आंदोलन का सफर।)
— Ritesh Choubey
Founder & Chief Editor,
Rajyog Journal
आगे की ऐतिहासिक यात्रा:
पंडित बिंदेश्वरी दूबे के जीवन का सबसे रोमांचक और अनसुना अध्याय—पटना सचिवालय गोलीकांड का वो आठवां छात्र और जेल की कालकोठरी का सच जानने के लिए अगला भाग अवश्य पढ़ें।
Inspirational
ReplyDelete